"अद्वैत अनुराग"
चन्द्रमुखी के मुख मण्डल पर, चंचल अलकें डोल रहीं, जैसे कस्तूरी मृग नयनी, चुपके से कुछ बोल रही। अधर गुलाबी पंखुरी जैसे, मदिर सुगन्ध बिखेर रहे, प्रेम-सिन्धु की लहरों में, प्रेमी के मन को घेर रहे। कंगन की वह मधुर खनक, और पायल की झंकार प्रिये, जैसे वीणा के तारों पर, छेड़ा हो श्रृंगार प्रिये। चितवन में है प्यास अनूठी, अधरों पर मुस्कान सजी, हृदय कुंज में आज अचानक, मिलन-राग की तान बजी। भ्रमर बना है प्रेमी मन, जो रूप-सुधा को पीता है, एक पल की दूरी में भी, वह युगों-युगों को जीता है। हाथों में जब हाथ थमे, तब थमती जग की सारी गति, प्रेम रंग में भीग रही है, रति-सम तेरी रूप-द्युति। साँसों में चन्दन की खुशबू, धड़कन में इकरार भरा, जैसे कोरी इस काया पर, चढ़ा सुनहरा प्यार हरा। बिखरी ज़ुल्फ़ें सावन जैसी, घटा सी काली छाई हैं, मानो स्वयं कामदेव ने, अपनी कला सजाई है। सूरज थमा, चंदा शरमाया, देख तुम्हारा रूप सलोना, बस चाह यही इस जीवन की—तेरा होकर ही है होना।
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