पहाड़ का सन्नाटा
खंडहर होते जा रहे घर, और आँगन में उगी घास है, अब इन ऊँचे शिखरों पर, बस सन्नाटों का वास है। बूढ़ी आँखों में ठहरी है, बाट जोहती एक नमी, सब कुछ तो है पहाड़ों में, बस अपनों की है कमी। खेतों की वो चौड़ी क्यारियाँ, अब बंजर होने लगी हैं, गाँव की वो पगडंडियाँ, जाने कहाँ खोने लगी हैं। दादी की वो पुरानी कोठार, अब ताले में सिसकती है, पहाड़ की जवानी अब, शहरों की धूल फाँकती है। वो ठंडी हवा, वो धारे का पानी, अब यादों में आता है, रोटी की मजबूरियों में, अपना घर छूट जाता है। देवभूमि पुकारती है, अपने बिछड़े हुए लालों को, पर कौन सुनेगा इन सूने, और बेजान हिमालयों को? थक गई हैं चौखटें इंतज़ार में, अब कोई दस्तक नहीं होती, इन पत्थरों के सीने में भी टीस है, पर ये दुनिया नहीं रोती। जहाँ कभी गूँजती थी किलकारियाँ, वहाँ सन्नाटा पसरा है, शहर निगल गया बेटों को, और गाँव बस एक खंडहर का टुकड़ा है। पहाड़ झुक गया है बोझ से, अपनों के बिछड़ने के गम में, अब तो चूल्हा भी ठंडा पड़ा है, बूढ़े माँ-बाप के आँगन में।
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