आशा
कण–कण से ईश्वर उड़ा नहीं जन–जन से शिव मुड़ा नहीं कोई जन्मा पर अवतार नहीं जिसे मातृभूमि से प्यार नहीं। यह धरा रक्त से सिंचित नहीं? शत्रुबोध, विषय, अब किंचित नहीं? कोई मंदिर खंडित करा नहीं? भारत में हिंदू मरा नहीं? यह भूमि का कोई युद्ध नहीं वो माने हममें कोई शुद्ध नहीं हम मन से जीतें, अब ये बात नहीं पर कुछ अपने, वीरों के साथ नहीं।
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