एकाकी महिला
बक बक बहुत करती है वो नियमित टहलने जाने वाली साथियों को सब बताने वाली भीड़ में भी अकेले रहती है वो । एक अधेड़ महिला किस्सों से भरी उसकी दुनिया पीड़ाओं का पिटारा लिए आती है मन की बातें कहने को छटपटाटी है । मौका देख किसी के साथ हो लेती फिर अपनी बात बताते जाती पर कोई नहीं सुनाता उसका यहां कोई नहीं समझता है उसके संवाद । सबको अपनी पड़ी है सुबह की जल्दी जल्दी पड़ी है अपनी दुनिया में सभी मस्त किसी के पास नहीं उसके लिए वक्त। उसने बताया घर पर भी कोई नहीं सुनता उसकी दुख को कोई नहीं समझाता रोक नहीं पाती हूँ मैं अपने विचारों को घबराहट बेचैनी से जुझ रही सालों से। अपनों ने ही छला था मुझे तब से अब तक झेल रही हूँ अब सब फिर से साथ आ गए अभी तक मैंने परेशान पड़ी हूं।
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