में मौन होने आया था
एक शाम किनारे जहां कुछ पत्तों का ढेर था , नीचे सुलग रही किसी की हड्डियां ओर सामने दो नदियों का मेल था , उस गुमनामी की नाव पर , एक पर के छाव पर , एक स्ट्रीट लाइट के रौशनी तले में मौन होने आया था । में मौन होने आया था , अपने विचारों से दूर , अपने ख्वाबों से दूर , व्यवहारों से दूर प्रयासों से दूर जिम्मेदारी से दूर में मौन होने आया था कहीं जीवन से दूर । में जो अपने विचारों के कहने का आदि था में जो कभी हर सवाल पूछने वाल पर हावी था , आज खुद के पूछे कुछ सवालों से घिरा हू , कुछ सवालों से घिरा हू , कुछ नाकामयाबी में लिपटा हु ।। सामने पड़ी उन पत्तों जैसे , में भी जैसे सिमट गया हू, बुझ चुकी उस राख जैसे , में भी जैसे भिखार गया हू, अंतरमन में चल रही , इस जंग से लड़ने आया हू , में कारण जानने आया हू, में मौन होने आया हु ।। जवाब मिला उस वायु से जो अंतरमन को ठंडक देती , जवाब मिला उस राख से की अंतिम दुर्दशा कैसी होती , जवाब मिल उस नदी से , की सदा ही राह बनाते चलना , जवाब मिला उस गुमनामी से , की एकांत में ही है चिंतन करना ।। जवाब मिला फिर अंतरमन से , हर कारण भी फिर स्पष्ट हुआ , में प्रश्नों के साथ आया था , में जवाब मांगने आया था , में चिंतन करने आया था , में उत्तर जानने आया था , में खुद को जानने आया था , में मौन होने आया था ।।
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