कागज़ी मुलाकात
स्याह काली मुकद्दर की उस रात को लिखूँगा, मैं कलम उठाऊँगा और दिल की बात लिखूँगा। जहाँ ज़माने भर की तोहमतें मेरे नाम होंगी, तुझे मैं पाक-साफ़, ख़ुद को दाग़-दार लिखूँगा। ये जो फासले हैं दरमियाँ, इन्हें मिटते देखूँगा, हकीकत में न सही, ख़्वाबों में चलते देखूँगा। मालूम है मुझे कि तू कभी मुकम्मल मिलेगा नहीं, पर एक किताब में अपनी मुलाक़ात लिखूँगा। लिखूँगा वो पल, जब नज़रें झुक कर मिली थीं, वो अनकही बातें, जो लबों पर ही खिली थीं। तुझे हर पन्ने पर एक मुकम्मल वफ़ा बना दूँगा, मैं अपनी मोहब्बत को इक मुक़द्दस गुनाह लिखूँगा। नसीब की लकीरों में तेरा ज़िक्र न सही तो क्या, मैं अपनी ही स्याही से जन्नत का हाथ लिखूँगा। दुनिया पढ़ेगी हमें एक मुक़म्मल कहानी की तरह, मैं काग़ज़ के टुकड़ों पर अपनी कायनात लिखूँगा।
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