श्रृंगार-शिखर
प्रिये तुम नवल-कुसुम सी कोमल, मैं भ्रमर सा मतवाला हूँ, तुम पुण्य-पर्व की ज्योति प्रखर, मैं अनुराग का उजाला हूँ। तुम्हारे मुख-मंडल की आभा, पूर्ण-शशि को लजाती है, जब झपकती हो तुम ये पलकें, सृष्टि थमी रह जाती है। तुम शब्दों की शुचिता जैसी, मैं मौन भाव का दर्पण हूँ, तुम सृजन की आदि-शक्ति हो, मैं पूर्ण रूप से अर्पण हूँ। तुम्हारी कटि की किंकिणी मानों, मधुर वेदों की वाणी है, तुम वो स्वप्निल अप्सरा हो, जिसकी देवों ने कथा बखानी है। तुम्हारी भृकुटि का ये धनुष, हृदय पर तीर चलाता है, कपोलों की ये सुर्ख लालिमा, देख गुलाब लजाता है। मृगनयनी के इन चंचल नयनों में, प्रेम अगाध समाया है, तुम साक्षात रति की मूरत, तुम पर रूप ही छाया है। स्वर्ण-सांध्य सी तुम प्रिय मेरे, अम्बर पर छा जाती हो, जब नूपुर ध्वनि करती हो तुम, सोया भाग्य जगाती हो। मेरे अस्तित्व के मरुथल में, तुम अमृत-धार सी नदियाँ हो, भटके हुए इस नाविक का, तुम ही सहारा सदियाँ हो। यह जन्मान्तर का मेल अनूठा, प्राणों की अमिट रवानी है, मैं तेरा एक शून्य अधूरा, तू मेरी पूर्ण कहानी है।
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