क्या होगा !
क्षीण होता शरीर है मन अभी तो मजबूत बना आत्मा तो अभी जगा है न जाने आगे क्या होगा। उम्र के आधे पड़ाव में अधखुली नींद के प्रभाव में जिंदगी तो अभी शुरू हुईं है न जाने आगे क्या होगा। अभी तो चलना भी सीखा नहीं हाय शाम ढलने लगी वक्त खिसकता जा रहा न जाने आगे क्या होगा। शेखर को पहचाना इतनी देर से अभी तक भटकाव में जीता रहा अभी तो थपेड़ों को सहना सीखा है क्या पता इस मझधार में ही रात हो। दीपक अब बुझने को हो चला सफर देर से शुरू किया अभी तो इस जन्म का हेतु समझा न जाने किस मोड़ पर विश्राम हो । समय कम है राह है बहुत लम्बा बीच दोपहरी सोच रहे न जाने आगे क्या होगा।
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