मैं
कल तलक जो दिन और रात मेरे साथ थे, उन्हीं रिश्तों में कोई बोझ अंजान हुआ हू मैं। जरा सलीके से कहते तो उफ़ भी न करूं, जमाने के हर पत्थर का मुकाम हुआ हू मैं। लोगों ने भी खूब बातें बनाई मेरी कहानी की, कुछ नहीं बस मुहब्बत में बदनाम हुआ हू मैं। अपनों ने जब से पहचानना छोड़ दिया है, अपने ही घर में कोई मेहमान हुआ हू मैं। भूल गए हैं जब से वो अपनी मुहब्बत को, गुजरे हुए वक्त का आज निशान हुआ हू मैं। कभी मुश्किल तो कभी आसान हुआ हू मैं, हर बार नए आगाज से परेशान हुआ हू मैं। कभी इठलाया हू मैं ख्वाबों में ख्यालों में, कभी इस जिंदगी से इतना हैरान हुआ हू मैं। मेरे दर्द का वजूद तुमको क्या समझाऊं अब, जिंदा भी हु और खुद ही शमशान हुआ हू मैं।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
