तुम आना...
ना बताना मुझे कि तुम कहाँ थी, क्यों थी, किसकी थी, बस यूँ ही लौट आना— जैसे कभी मेरी खामोशियों में बस जाया करती थी। तुम आना, पर मेरी आँखों में मत देखना, क्योंकि वहाँ अब भी तुम्हारी ही परछाई है जिसे मैं मिटा नहीं पाया। तुम आना, पर मेरे पास मत बैठना, बस सामने बैठना— उतनी ही दूरी पर, जितनी दूरी बनाकर तुम चली गई थी। तुम आना, पर ये मत कहना कि तुम किसी और के साथ हँसती थी, या किसी और के कंधे पर सिर रखती थी, कुछ बातें अनकही ही ठीक लगती हैं। तुम आना, पर इस तरह आना— कि तुम्हारे आने से पुराने जख्म फिर से ताज़ा ना हों। और अगर फिर जाना हो, तो ऐसे जाना— कि इस बार तुम्हारे जाने के बाद मैं तुम्हें याद भी ना करूँ।
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