बेटियां...
जिन माँओं ने बेटियों को सीख दी कि ठहाका भाई का है, तुम मुस्कुराओ . दूध वो पी लेगा, तुम चाय ले जाओ. उसे जाने दो बाहर, तुम घर ठहर जाओ. अभी उसे और सोने दो, तुम उठ जाओ. देखने दो उसे टीवी पर मैच, तुम रसोई में जाओ. उसके तो लहज़े में रौब ही फबता है, तुम ज़रा धीमे बतियाओ. उसकी बात काट रही? जुबान पर ज़रा लगाम लगाओ . उसे तो यहीं रहना, तुम्हें दूसरे घर जाना तो ढंग-तरीकों में ढल जाओ.... वे माएँ ज़रूर किसी बेबस माँ की बेटियां रही होंगी.. तुम वैसी मत बनना अपने दिल की सुनना सारे बिखरे सपने चुनकर अपनी बेटी के लिए पंख बुनना.... कलम जो देखती है वही लिखती है और लोग कहते हैं , जमाना बदल गया है...
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