अहंकार का हिरणाक्ष्य
अहंकार का हिरणाक्ष्य ~~~~~~~~~~~~~~~~ जब भर जाएगी यह धरा, रत्ती भर भी जगह न बचेगी। स्वार्थ, लालच के बोझ तले, प्रकृति स्वयं ही कराह उठेगी। तब आएगा हिरण्याक्ष फिर, न रूप पुराना, न नाम वही— मानव के भीतर ही छिपकर, ले जाएगा संतुलन सभी। ले जाएगा धरा को खींच, अंधे लोभ के पाताल में, जहाँ डूब जाएंगे स्वप्न सभी, अपनी ही बनाई जंजाल में। जिसका सृजन हुआ है जग में, उसका विनाश सुनिश्चित है— पर याद रहे, इस विनाश में भी, छिपा सृजन का ही संकेत है। नन्द गोपाल अग्निहोत्री ✍️
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