विश्वास
सोचा हमेशा मुझसे किसी का बुरा न हो, नेकी हुई तो दरिया में डुबोता चला गया । कटुता की सुई लेकर खड़े थे जो मेरे मीत, सद्भावना के फूल मैं पिरोता चला गया । नफरत का भाव ज्यों-ज्यों खोता चला गया , मैं रफ्ता-रफ्ता आदमी होता चला गई । फिर हो गया प्यार की मैं गंगा तर-बतर, गुजरा जिधर से सबको भिगोता चला गया । जितना सुना था उतना जमाना बुरा नहीं, विश्वास अपने आप पर होता चला गया ।
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