जिंदगी तेरा भरोसा नहीं
ज़िंदगी तेरा भरोसा नहीं" ज़िंदगी तेरा भरोसा नहीं , आगे बढ़ते जाओ निरन्तर क्रोध, द्वेष, राग सभी को रखकर सबसे परे कर्मों को अपने करते जाओ निष्काम सारे लेखों का यहीं ही होगा भुगतान। दिल में जो भी उमंगे जगी हो उनको शीघ्र ही पूरा कर डालो कोई क्या सोचे ,क्या होगा आगे उसकी परवाह करना छोड़ दो। एक पल का भरोसा नहीं कब प्राण साथ त्यागे दिलों में रखोगे कड़वाहट किसी संग अंत में पछतावा जागे। ये तेरा ये मेरा करने में कोई जीवन सार नहीं करोगे सहायता निराश्रितों और अपनों की तभी जीने का वास्तविक आधार ही । छू लो ऊंचाइयों को एक उन्मुक्त पंछी जैसे ज़िंदगी तेरा भरोसा नहीं कब कोई अरमान छूट जाए। पुनः बचपन की ओर लौटकर एक बालक समान निर्मल बनो भूलकर सारी चिंताएं दुनियादारी की एक बार फिर से मदमस्त और खुशहाल बनो। ज़िंदगी तेरा भरोसा नहीं कब तू एक याद बनकर रह जाए। फ़िर से न मिलेगी ये सारी दुनियां और रिश्ते नाते क्यों न इन सभी के साथ वक्त रहते खुलकर इसे जिया जाए । स्वाति की कलम से ✍️
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