झूठी मुस्कान के सच
कभी वक़्त ने साथ दिया तो, मैं अपने बोझ को शब्दों में ढाल दूँगा, जो हिम्मत के चेहरे के पीछे छुपा है, उस मासूम को उजागर कर दूँगा। वो जो हर दर्द को हँसी में छुपा देता है और कहता है “सब बढ़िया है,” उस खामोश झूठ के अंदर उमड़ते अनगिनत तूफ़ानों को बयान कर दूँगा। नहीं सजाऊँगा मैं बस जीत की चमक से अपनी कहानी, मैं तो गिरकर भी संभल जाने वाले उस टूटे गर्व की निशानी लिखूँगा। लिखूँगा वो खामोश रातें, जब आंसू ही मेरे हमराज़ थे, और सुबह होते ही खुद को फिर से मजबूत दिखाने का वो अंदाज़ लिखूँगा। अगर लिखने बैठा कभी सच में, तो खुद को ही उतार दूँगा कागज़ पर, अपनी रूह के हर दर्द को इज़्ज़त देकर, उसे ही अपनी पहचान लिखूँगा।
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