खामोश बाते
झुकी नज़रे कह गई सौ बाते अपने अर्थपूर्ण चुप्पी में, नाच उठे आंगन, खिल उठे फूल; ना सवाल उठा, न जवाब आया, फिर भी बात पक्की हुई नैनों के मूक वादों से जो बिन सुने ही सबका जश्न बन गया।
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