हम उम्र
आदतें रवैया बन जाती है ,क्यों कुछ वक्त के बाद वो रोए जो सर रख कर तो मेरा शाना नहीं देता। आग नफरत की जब भड़की है इस शहर में तब परिंदों ने आसमान को देखा तो आशियाना नहीं देखा। जमीन पर लेट कर आसामान तकने का मजा वो है, के कल रात उसने मखमल का बिछौना नहीं देखा। उम्र कम है के अभी उस ने जमाना नहीं देखा, उसे लगता है किसी ने उसका आना जाना नहीं देखा। ये महफिल हर फनकार से कहती हैं यही एक बात, हमने गाना तो देखा ऐसा,मगर गुनगुनाना नहीं देखा। हर किसी से हंस कर दिल की बात करता रहा, यहां कौन अपना होगा कौन बेगाना नहीं देखा।
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