मेरी मुस्कान, मेरी पहचान
मैं जैसी हूँ, वैसी ही हूँ मुखौटों की इस दुनिया में, नकली चमक मुझे भाती नहीं, जो ओढ़नी पड़े उधार की, वो छाया मुझे सुहाती नहीं। न बनावटी मुस्कान है मेरी, न शब्दों में कोई जाल है, जो हृदय में है, वही अधरों पर, बस यही मेरा हाल है। काँच के महलों की भीड़ में, मैं मिट्टी का एक दिया हूँ, कमी मुझमें भी होंगी हज़ार, पर मैंने खुद को जी भर जिया है। दिखावे की धूप से बेहतर, मुझे मेरी अपनी परछाईं लगती है, भीड़ का हिस्सा बनने से अच्छा, अपनी तन्हाई ही सच्ची लगती है। _प्रिया तिवारी (प्रियु)🌹
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