मणिकर्णिका घाट 🙂
भाग रही है दुनिया सारी , पर अंदर से सब अकेले हैं, मणिकर्णिका के घाट पर आकर , खत्म ये सारे मेले हैं। क्या पाया और क्या खोया , सब हिसाब यहीं रह जाता है, इंसान बस धुएं का एक बादल, जो हवा में उड़ जाता है। मन हमेशा उलझा रहता है, कल की झूठी बातों में, पर जीवन का असली सच जलता है, इन घाटों की रातों में। भीड़ बहुत है आस-पास, फिर भी मन में एक सन्नाटा है, इस गहरे अकेलेपन से ही पूछो, ज़िंदगी का क्या नाता है। खाली हाथ ही आए थे हम, और खाली हाथ ही जाना है, ये जीवन बस कुछ पल का धोखा, और राख ही असली ठिकाना है। .....
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