Unresolved Mysteries
उन्नति की राह पर चलना था, पर संवेदना पीछे क्यों छूट गई? बराबरी का अर्थ तो न्याय था, फिर निर्दयता नई पहचान क्यों बन गई? स्त्री सच में उन्नति की राह पर है? देखो न, पहले पुरुष ही स्त्री पर अत्याचार करता था, अब कुछ स्त्रियाँ भी बेवजह किसी की जान लेने लगी हैं। ख़ूबसूरत मासूम आँखों की ओट में विष छिपाए, कभी सभ्यता और सौम्यता की जननी कही जाती थी, आज वही कुछ चेहरे अपनी पहचान बदलकर उसे ही उन्नति का नाम देने लगे हैं। जो कभी भावनाओं को सँभालना जानती थी, सही-ग़लत की परख रखती थी, अब तुच्छ कारणों से रिश्ते और जीवन दाँव पर लगाने लगी है। अस्वीकार है मुझे ऐसी उन्नति, अस्वीकार है मुझे ऐसी असंवेदना। सुधार तो उस सोच में होना था, जो पुरुष को सही राह पर ले जाती, न कि ऐसी प्रवृत्तियों को अपनाना था, जो स्वयं उस अन्याय को प्रतिबिंबित करती।
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