Tumhe likhti hu..
मैं तुम्हें लिखती हूं.. लिखते वक्त तुम्हें अपना लिखती हूं तुम्हें खुद मे लिखती हूं, तुम्हें एक कोरा कागज लिखती हूं , फिर उसमें लिखे हर शब्द की तरह खुद को तुममे समाया हुआ लिखती हूं, मैं मेरे आज में मेरे कल में.. मेरे हर पल में तुम्हें लिखती हूं .. मेरे ख्यालों में , मेरे ख्वाबों में, मेरें एहसासों में मेरे सांसों में मैं तुम्हें लिखती हूं .. मैं अक्सर शीशे में खूद को देखतें वक्त.. अपनी नजरों से अपने दर्पण में तुम्हें लिखती हूं.. जैसे मुझमें समा गए हो तुम.. खुद को अब मैं ऐसे देखती हूं.. सुनो !!.... तुम्हें पता है क्या ? मैं सिर्फ तुम्हें लिखती हूं .. और लिखती वक्त तुम्हें अपना लिखती हूं ।। वंशिका चंद्रवंशी ।।
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