Tum Ho...
तुम गंगा-सी पवित्र हो, और मैं तुम्हें पूजने वाला एक पुजारी हूँ। एक बात कहो, प्रिये — तुम यदि अंतरिक्ष-सी अनंत हो, तो क्या मैं तुम्हारा तारा हूँ? पथिक मेरे जैसे के लिए, तुम वृक्षों से बनी छाँव सी। मुरझाए पत्तों को जीवन देने वाली, तुम सूर्य की किरण भी हो। तुम झरने-सी चंचल, और सागर-सी शांत भी हो। तुम्हारी पर्वत-सी ऊँचाई, और आकाश-सा विस्तार भी तुम हो। जिन्हें किरणों का अलंकार मिला, तुम वही वर्षा-ऋतु की संध्या जैसी। जिसे देखना भी नसीब न हो, मैं वही अभागा हूँ। एक बात कहो, प्रिये — तुम यदि सूर्यमुखी-सी उज्ज्वल हो, तो क्या मैं तुम्हारा भ्रमर हूँ? जिससे दुखों का निवारण हो, वही औषधि तुम हो। जो मन को मोहित कर ले, वही सुर भी तुम हो। तुम कोयल के गीत-सी मधुर, और बादलों के संगीत-सी गहरी भी तुम। मस्तिष्क को उलझा देने वाले, गणित के प्रश्न-सी कठिन भी तुम। तुम अमावस्या में छिपी चंद्रमा-सी, और मैं तुम्हें तरसता चकोर हूँ। समझो, प्रिये — तुम हो सागर मेरे लिए, और मैं तुम्हें खोजती एक नदी हूँ। तुम इंद्रधनुष के सब रंगों-सी सुंदर,6 और मैं तुमसे रंग चुराती एक प्रतिमा हूँ। तुम कवि की लिखी कविता-सी सरल, और मैं जो इसे भी न समझे — वह मूरख हूँ। तुम व्यापार में लाभ समान, और मैं तुम्हारी राह देखता व्यापारी हूँ। एक बात कहो, प्रिये — तुम यदि सीता हो मेरे लिए, तो क्या मैं तुम्हारा श्रीराम हूँ? ~ॐ बिस्वाल
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