Tum ek sadak ho
कुछ लोग समंदर होते हैं, और कुछ समंदर की तरफ़ जाती हुई सड़क। तुम शायद सड़क हो। जिस पर धूल भी चलती है, तन्हाई भी, और कभी-कभी अपनी ही मंज़िल से भटका हुआ कोई ख़्वाब भी। तुम्हारी सबसे बड़ी मुश्किल यह नहीं कि लोग तुम्हें समझते नहीं, मुश्किल यह है कि तुम ख़ुद को हर रोज़ एक नए अर्थ में पढ़ लेते हो। कल जो शब्द थे, आज सवाल हैं। आज जो सवाल हैं, कल शायद पूरी किताब हो जाएँ। और जब यह किताब मुकम्मल होने लगती है, तो तुम इसे किसी और को सौंपने के बजाय, अपने ही अंदर की एक खाली इमारत में छिपा आते हो। एक ऐसी इमारत, जहाँ अब कोई मुसाफ़िर नहीं आता... तुम्हारे भीतर एक अजीब-सा शोर रहता है जैसे किसी वीरान मकान में अब भी कोई खिड़की हवा से बहस कर रही हो। और उसी शोर के बीच एक बच्चा भी है, जो अब तक यक़ीन करता है कि अगली सुबह पिछली सुबहों से अलग होगी। यही बच्चा तुम्हारी सबसे बड़ी ताक़त है। यही तुम्हारी सबसे बड़ी भूल भी। तुम्हें लोग अक्सर अधूरा समझेंगे। क्योंकि मुकम्मल चीज़ें आसानी से समझ आ जाती हैं, और तुम तुम कोई उत्तर नहीं, एक ऐसा प्रश्न हो जिसे लिखने वाले ने ख़ुद मिटाने से इनकार कर दिया हो। तुम मंज़िल नहीं ढूँढते, तुम उन रास्तों को ढूँढते हो जो तुम्हें हर बार नया बना दें।
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