The watch
घड़ी.... पुरानी घड़ी, पश्चिमी छोर....., औपनिवेशिक काल की, अभी भी बिना प्राण के मेज पर पड़ी है.... मच्छरों की गप्पों के बीच एक शाम, मेरे पिता ने मच्छरों को बैट से मारते हुए घड़ी के बारे में बात की... "वास्तव में घड़ी मेरे चाचा की थी.... बाद में, उन्होंने मुझे उपहार में दी.... "सच में, किसी ने कभी घड़ी का इस्तेमाल नहीं किया... यह हमेशा वहाँ थी...... औपनिवेशिक काल में यह पश्चिम की ओर देखती थी, बाद में, पूर्व की ओर अब, अंधे की तरह लेटा हुआ हूँ जैसे दिशाओं का बोध खो गया हो.... पिता आगे कहते हैं, "जब मुझे कोचीन बंदरगाह में नौकरी मिली, मैंने पश्चिमी छोर पर जाना चाहा लेकिन, इसकी सुइयाँ एक पल के लिए डर से काँप उठीं और हमेशा के लिए रुक गईं.... अब, प्यारे बेटे, तुम ही निगरानी करने वाले कुत्ते हो.... मेरे पिता, उनके चाचा और मैंने कभी इसकी ओर नहीं देखा, या, अब तक मेज को छुआ तक नहीं.... अब, मैं चाहता हूँ, मेरा बेटा कभी अगला न बने वॉचडॉग.... घड़ी अभी भी मेज़ पर है.... मेज़ एक तरफ़ झुकी हुई है, जो यह दर्शाती है कि यह कमज़ोर हो गई है... पश्चिमी छोर की घड़ी एक झुके हुए तल पर फर्श पर फिसल रही है.... यह अब मेज़ के गिरे हुए तख्तों से ढकी हुई है..... (सी) रवींद्रनाथ कुनाथ कोच्चि, केरल, भारत।
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