soch pr marta desh
बुढ़ी सोच ने क़दमों को रोक रखा है, नए सपनों को परदों में ढक रखा है। जो वक़्त के साथ बदलना था हमें, उस जड़ सोच ने दिलों को कस रखा है। आज लोग अपने ही सुख-सुविधा में खोए हैं, देश के लिए समर्पण के मायने ही क्या हुए हैं। जहाँ त्याग और बलिदान थे पहचान हमारी, अब स्वार्थ की परछाई ने राहें ही ढक ली हैं।
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