sitara
जब भी मैं रात को बाहर जाता, तो आसमान में एक अलग सा सितारा मुझे दिखता था। आसमान तो सितारों से भरा होता था, लेकिन वो एक सितारा बाकी सब से बिल्कुल अलग लगता। उसकी चमक अलग थी, उसकी रोशनी में एक खिंचाव था, और उससे जुड़ी एक अनकही-सी भावना थी — जो किसी और में नहीं थी। चौंकाने वाली बात ये थी कि उस रात आसमान में एक बड़ा सा चाँद भी था, जो साफ-साफ चमक रहा था। लेकिन फिर भी, उस छोटे से सितारे की रोशनी, मेरे लिए, चाँद के बराबर थी। वो सिर्फ एक सितारा था, पर उसका असर कुछ और ही था। लगता था जैसे उस रात के माहौल में, उसी सितारे की वजह से कुछ खास जुड़ गया हो। जैसे उस पल ने दिल में अपनी जगह बना ली हो। अब तक मैं नहीं समझ पाया कि आखिर वही सितारा मुझे क्यों इतना आकर्षित कर सका। जब और भी बहुत कुछ था देखने के लिए, तो बस वही क्यों महसूस हुआ? फिर धीरे-धीरे वो सितारा दिखना बंद हो गया। और उसके साथ ही, जैसे पूरा आसमान खाली-सा लगने लगा। वो राते वैसी नहीं रहीं। जैसे उस एक सितारे के जाने के बाद, आसमान ने अपनी आत्मा खो दी हो। -शिवांशु वशिष्ठ
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