sham
खुदा ने फरमाया हर जलाल मेरे बस्ते जहां में बस एक शर्त रखी की मोहब्बत तेरी तकदीर मे नही फिर क्या हर हुकुम माना हमने हांसा सबके सामने अलग है रो देता हु कभी और बातें मुकम्मल हैं भी सही अब वो कर रहा नाम उसके आसमां हम दें भी क्या कल दे दु जमी सारी पर आज तो बुझ रहा है मेरा हर शमा अब आलम ए है की खुद नहीं मानता मैं खुद को लायक तेरे कितना गलत था मैं पांव दोजक में लटक रहे और ख्वाहिश जन्नत के थे मेरे ।
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