Self Introspection
ये आँखों ने बहुत देखे हैं दूर तक के सामान, आँखें बंद होतीं तो शायद दिख जाते ख़ुद के अरमान। ये कानों ने बहुत सुना है दूसरों के बयान, कान बंद होते तो शायद सुन लेते अपने मन की बात। ये लबों ने बहुत दूर तक हैं शोर मचाया , लब सिले होते तो ख़ुद से कुछ गुनगुना लिया होता शायद। इस क़लम की स्याही ने ख़ूब लिखे सबके जज़्बात, क़लम में अश्क भर दिया होता तो शायद लिख पाता ख़ुद के ख़यालात। मशरूफ़ बनकर सबसे ख़ूब प्रशंसा पाई है मैने, थोड़ा कामचोर होता तो ख़ुद की तारीफ़ कर पाता शायद। खाली समय में बहुत कुछ किया है मैंने, थोड़ा खाली बैठा होता तो ऐसी नौबत न आती शायद। उत्कर्ष केशरवानी।।
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