Sagar Khayal
She: तुम्हें कभी ऐसा लगा... कि हम कोशिश करते रहे... और फिर भी हार गए? He: हर रोज़... जब तुम्हें खोने का डर, तुम्हें खो देने से ज़्यादा भारी लगता था। She: मैं तो अब भी वहीं हूँ... उसी आख़िरी बात में अटकी हुई... जहाँ तुमने कुछ नहीं कहा — और मैं सब समझ गई। He: मैं कुछ कहता भी तो क्या बदलता? तुम पहले ही जा चुकी थीं... बस रुकी थीं, एक अलविदा सुनने के लिए। She: मुझे अलविदा नहीं चाहिए था... बस एक बार कहते कि "रुको", तो रुक जाती। He: और मैं चाहता था कि तुम बिना कहे रुक जाओ... शायद यही मेरी सबसे बड़ी ग़लती थी। She: हम दोनों ने अपनी चुप्पियों से बहुत कुछ कह दिया... काश किसी दिन, हम बोल लेते। He: काश उस रात तुमने मेरी आँखों में झाँका होता, वहाँ एक बिखरी हुई दुनिया पड़ी थी... सिर्फ़ तुम्हारे नाम की। She: अब भी कभी-कभी लगता है... तुम पुकारोगे। और मैं मुड़ जाऊँगी... He: मैं अब भी पुकारता हूँ... बस तुम्हें सुनाई नहीं देता। She (धीरे से): शायद अब... सुनने की हिम्मत नहीं रही।
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