Rights
इस शहर में लोगों को लोगो से, अक्सर मैंने उलझते हुए देखा है। सुबह के खिले हुए चेहरे को यहां, अक्सर शाम को मुरझाते हुए देखा है।। जो नहीं उठा सकते थे कभी भी, आवाज खुद के अधिकारों के लिए। उन्हें अक्सर दूसरों के अधिकारों को, छीन ने की कोशिश करते हुए देखा है।। गर मालूम हो या न हो किसी को यहां, मैने राह में पड़े हुए कांटों का सफर देखा है। वक्त आज तुम्हारा है, कल किसी ओर का होगा, वक्त को भी अक्सर मैंने बदलते हुए देखा है।।
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