rana
अंत न वो गिनती हो जिसका, उस जहां का तारा तूं । रण रण में, और कण कण मे, सबका प्यारा राणा तूं । आवेग सा भूषण तें जो शुभता, तूर्कों का अंधारा तू । जटाधारी हुकम मानता, राजन! युद्धों का परवाना तूं ।। अतीत राणा संगा दअदा तेरा, बाबर को जो तेज खदेड़ा । पतित यमुना की लपटों में जाके, दौड़ा भगा पूंछ दबाया । हड़पने खुद के घर को हीं, मानसिंह जब हल्दी को दौड़ा। वे तो जीती जंग इक्क बस, जग जानदा दिल तूं जीता ।। जलाल भी रोया रूखसत होने से, रोया दूर दुश्मन भी तेरा। रक्त भी चमका यों वीरों का, मिट्टी भी धर ली रंग हल्दी सा। झांके तेरा रण घर उसके, किला कर लेता वो अपना अंधेरा। म्हारो प्रतापी!!और वीरों की ये धरती,ये घाटी "हल्दी" का।। खानदानी वीर है राणा तूं , बिन तुझ ये जग वीराना । राणा राणा रे बता दे राणा, किस मिट्टी का बना है तू।।
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