कृष्ण— अर्जुन (संवाद) part 2
शंकर के डमरू के तान मैं ब्रह्मा के वेदों का ज्ञान मैं फैला उजियाला जिस भानु से उसके रश्मी में निहित हां प्राण मैं ज्ञानी का ज्ञान मैं अज्ञानी का अज्ञान मैं हरती जो पाप को उस पतित तारिणी समान मैं द्रौपदी का चीर मैं सीता का नीर मैं मृत्यु को जीत लें वो योद्धा बालवीर मैं कर्म मैं अधर्म मैं पाप मैं पुण्य मैं जिससे सृजित सब वो आदि हां शून्य मैं भीष्म का प्रण मैं कुरुक्षेत्र का रण मैं रावण से रक्षा करू ऐसा हूं तृण मैं हलधर का हल मैं शकुनि का छल मैं जिसपे तू बोल रहा उस जीवन का बल मैं गांडीव की टंकार मैं दुर्योधन का अहंकार मैं शिव सम प्रचंड भी और माता का प्यार मैं जीवन आधार मैं प्रेम व्यवहार मैं गोपियों संग रास करू सोलह हजार मैं
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