मजहब(Pahalgam terror)
मजहब जान देता है ,या जान लेता है सुना है, मजहब कर गुजरता है जो वो ठान लेता है कोई बदनाम है मजहब के कारन किसी को को मजहब शान देता है कोई इंसानियत को तो कोई आतंक को मजहब मान लेता है क्या कहते हो मजहब के बारे मे तुम है मज़्हब अंगार या है कोई कुसुम कोई बतलाओ की है खुदा हसीं या कन्हा सुम जाने कैसी है ये धम, कहा जा रहा ये हुजूम है सुना एक नया सा किस्सा की कैसे जग हार रहा कोई किसी को उसके मज़्हब के काराण मार रहा कोई बेवस चीख रहा कोई मदद के लिये पुकार रहा हाँ, ये बस इसलिए क्योकी वो भगवान की आरती उतार रहा मजहब चुनता है मानव या मानव मज़्हब को चुन्ता है कहिं सपनो मे देह्सत है कोई नेक्ता के सपने बुन्ता है कोई कहता है गैर ह वो कोई किसी की ना सुन्ता है क्या हुआ ऐसा की मौत भी मजहब चुनता है क्यो लोग धर्म के तराजू मे तोले जाते है क्यो लोगो को धर्म बाटने को कहे जाते है क्यो हमरे देअह मे लोग धर्म के करम मारे जाते ह दिन क्यो न्ही आता है ये राते यो न जाते है( ) ~an Indian
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
