मैं कुछ सोच रहा हूं | तनहा
दिल ढूँढता है जाम, मैं कुछ सोच रहा हूं ऐ साक़ी-ए-गुलफ़ाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ क्या कीजिए अब काम, मैं कुछ सोच रहा हूँ आ पहुँचा तिरा नाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ इस दौर ने इंसान को बाज़ार बनाया क्या है मेरा अंजाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ गुम है मिरे अहसास का इक शहर-ए-मुसलसल किस पर रखूँ इल्ज़ाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ मरना भी ज़रूरी है मगर जल्द नहीं है बाक़ी हैं कई काम, मैं कुछ सोच रहा हूँ आने की ख़बर है तो उजालों को बुला लो ऐ काकुल-ए-गुलफ़ाम मैं कुछ सोच रहा हूँ किस तरह तेरे नाम से आबाद था आलम अब कैसी हुई शाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ नक़्शों में नहीं मिलता वो गुमगश्ता-सा आलम ढूँढूँ किसे हर गाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ तहज़ीब के चेहरे पे उदासी है मुसल्सल किस ने किया ये काम, मैं कुछ सोच रहा हूँ आँखों में तिरी दीद की ताबिन्दा तजल्ली हाथों में लिए जाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ दिल कहता है फिर आज उसी राह से गुज़रूँ ऐ हसरत-ए-नाकाम मैं कुछ सोच रहा हूँ मस्जिद में भी देखा है उसे, दैर में मैंने क्या उसका है इक नाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ मैं ख़ाक का ज़र्रा हूँ कि ख़ुर्शीद का हमज़ाद क्या है मिरा नाम, मैं कुछ सोच रहा हूँ तनहा' तिरे अशआर में इक दर्द छुपा है किस का है ये इनआम, मैं कुछ सोच रहा हूँ तारिक़ अज़ीम तनहा
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