nana ji
वो दिन याद है मुझे... जब सपने बिखर गए थे, जब हर राह बंद लगती थी, और खुद से भी नज़रे नहीं मिलती थीं। लोग कहते थे = "अब इससे क्या होगा?" आँखों में तरस नहीं, ताना था। और मैं? में ख़ामोशी में खुद से हार चुका था। पर एक इंसान था, जो मेरे पास बैठा रहा, ना कुछ पूछा, ना कुछ कहा बस अपनी हथेली मेरे कॉपते हाथों पर रख दी। वो मेरे पास नहीं, मेरे भीतर खड़े हो गए। मेरी टूटी हिम्मत को फिर से जोड़ा, मेरी थमी साँसों में उम्मीद बो दी। उन्होंने मेरी डूबी हुई आँखों में देखा, और कहा "गिर गया है तो क्या, अब ज़़मीन से उठकर आसमान छूने की बारी है।" मैंने कहा - "सब खत्म हो गया ..' उन्होंने मुस्कुरा कर जवाब दिया - "अब शुरू होगा वो जो कभी रुका ही नहीं था. ..तू।" जब में अपने आप को भी न पहचान पाया, वो मेरी पहचान बन गए। जब मैं बात करना भूल गया, वो मेरी ख़ामोशी को भी समझते रहे। उन्होंने मेरी टूटी हिमत को अपने कंधे पर रखा और फिर से चलना सिखाया जैसे कोई फौजी अपने जख्मी साथी को जंग के बीच से खींचकर लाता है। वो मेरी हार से नहीं डरे, क्योंकि उन्होंने मुझे कभी सिर्फ मेरी जीत से नहीं चाहा। आपने मुझे 'तब थामा जब में खुद को छोड़ चुका था। आपने मेरी हार को अपनी जीत बना दिया। मैं नहीं जानता क्या होता है 'आख़िरी अलविदा' मेने कभी सोचा ही नहीं अपने आप को आपके बिना आपके बिना तो हमारा वज़ूद ही अधुरा है, जिसे मंदिर बिना दीपक या दिल बिना धड़कन!
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