musafir
अलग रहा पे अलग मोड़ पर निकल पड़ा हूं मैं शाकीरा भूल के हर एक एक आलम को चल पड़ा हूं मैं शाकीरा खो के खुद को खुद में अब बस पा लिया हूं एक मुसाफिर मैं मुसाफिर मुसाफिर मैं मुसाफिर....... ना भटकूं किसी मोड़ पे ना रुके कदम छांव पे मैं चलता रहूं एक राह में ना मंजिल मेरा दाव पे ना दिल का वास्ता मेरा है न राह पे मेरा डेरा है मैं एक गुमसुम सा राही हूं मैं चला एक मुसाफिर हूं मैं मुसाफिर मुसाफिर मैं मुसाफिर....... मैं रही एक पंछी सा हू ना फिकर मुझे कल का है जो निशा पड़े हैं राहों में वो गवाही है मेरे सैर के जो ख्वाब था देखा आंखों में वो सच होता इसी राह में हां खुले आसमान के तले मैं चलता रहूं राही बने मैं मुसाफिर मुसाफिर मैं मुसाफिर....... ना राह में पत्थर एक हैं ना कांटों का कोई जिक्र है हमराही रात का चांद है और सुबह सूरज साथी है हर कदमों में ख्वाब को बुना हूं मैं खुद से खुद में उलझा हूं बस एक बेफिक्र सा राही हूं मैं बागी एक मुसाफिर हूं मैं मुसाफिर मुसाफिर मैं मुसाफिर.......
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