बनारस - lv
हो घाट बनारस का और साथ तुम्हारा, बेशक शिव की हूँ मैं, पर तुम हमारे। मणिकर्णिका से सीखेंगे हम अविरल प्रेम का सार, और पवित्रता होगी जैसे गंगा की निर्मल जलधार। तंग गलियाँ सिखलाएँगी तंगी में भी खिलखिला बस बढ़ते जाना, नुक्कड़-नुक्कड़ महकेगी खुशबू, मीठे रिश्तों की मिठास बढ़ाना। नंदी भी आएँगे, जब तुम दुविधा के दलदल में उलझोगे, मन के उलझे तारों से जूझकर ही तो बाबा से सुलझोगे। अलौकिक गंगा आरती-सा होगा जीवन में उजियारा, अस्सी की सीढ़ियों पर ख़्वाबों को मिलेगा किनारा। काशी की धुन में मस्त जीवन अनुराग सुनाएगा, हर रूठा मौसम भी फिर प्रेम की मनुहार गाएगा। दिव्यता की चौखट पर बस इतनी फ़रियाद करेंगे, सुख की हो या दुख की बारिश, हर दम साथ चलेंगे। और जब काया की सांझ ढलेगी धीरे-धीरे धूप किनारे, तब भी घाट बनारस का होगा, और तुम साथ हमारे।
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