kyo dhong kr rhe saare
क्यों ढोंग कर रहे हैं सारे, ये मुस्कानें, ये वादे, ये अफ़साने, दिल की खामोशी में छुपे वो घाव कौन देखेगा? जो लहू बहा था कभी चुपचाप ख़्वाबों से, वो लहू अब जमी हुई यादों की शक्ल में ठहरा है। तुमसे बात करना भी जैसे एक रस्म रह गई, जहाँ जज़्बात मर चुके, पर अल्फ़ाज़ ज़िंदा हैं। तुमने कहा था, मोहब्बत एक सच्चाई है, पर मैंने तो इसे सिर्फ़ बिखरते देखा है। इस शहर की रगों में झूठ दौड़ रहा है, हर चेहरा जैसे एक आईना, जो सच से डरता है। यहाँ हर रिश्ता बस एक समझौता है, जहाँ मोहब्बत भी अपनी कीमत पर बिकती है। मैंने अपने दर्द को नज़्मों में पनाह दी, पर कौन समझ पाया कि ये अल्फ़ाज़ नहीं, ये चीखें हैं, जो चुप्पियों के पर्दों में दबी हैं। तुमने सोचा होगा, मैंने तुम्हें भुला दिया, पर हक़ीक़त ये है कि तुम अब भी मेरे अंदर कहीं जिंदा हो, जैसे कोई घाव, जो भरता नहीं, जैसे कोई रात, जो खत्म नहीं होती। क्यों ढोंग कर रहे हैं हम, इस ज़िंदगी के झूठे रंगों का, जहाँ हर खुशी एक छलावा है, और हर दर्द, एक नया घर तलाशता है। चलो, सच्चाई को अपने सीने से लगा लें, और मान लें कि मोहब्बत कभी हमारी थी ही नहीं।
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