khat
तेरे नाम एक ख़त लिखता हूँ अपने मन की हर बात उसमें लिखता हूँ श्याही से लिखे अक्षरों का तो सिर्फ बहाना है मेरा मकसद तो केवल तुझ तक अपनी बात पहुचाना है कभी-कभी कुछ सवालों की बेड़िया लिखते-लिखते कलम को रोक देती हैं कुछ पल के लिए जज्बातों को अक्षरो में तबदील होने के इस सफर को तोड़ देती है मसला ये नहीं है कि ये ख़त तुझ तक कैसे पहुंचेगा सवाल ये है कि क्या ये ख़त तुझ तक पहुँचेगा कर भी तुझ तक पहुँचेगा जब भी ये ख़त तुझको मिलेगा यहां बैठे बैठे मुझको पता चलेगा तेरे चूने से हर शब्द और उनमें छुपे ज़ज़्बात तेरी खुशबू से महक उथेंगे इस खुशबू को मुझ तक पहुंचाने की कोशिश करेंगे पढ़ते वक्त जब ये शब्द तेरे होठों पर आएंगे उन होठों की मिठास को मुझ तक लेकर आएंगे पढने के बाद अगर इस ख़त को अपने सीने से लगाओगी मेरी धड़कन को अपने दिल में महसूस कर पाओगी इस को पढ़ने के बाद अगर हल्की सी भी मुस्कान तुम्हारे होठों पर आएगी मेरे इश्क को कबूल करने की हामी अपने साथ लाएगी - Ritik
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
