"Kathputli" (कठपुतली)
बोलने भी नहीं देती, चुप रहने भी नहीं, हर बात में बस उसकी चलती है कहीं। हँसने नहीं देती, ना रोने का हक, दिल में है तूफ़ान, पर होठों पे शक। जीने भी नहीं देती, मरने भी नहीं, सांसों पे भी अब रही उसकी निगहबानी। आखिर क्या चाहती है, क्यों ऐसे सताती? कठपुतली बना के, हर डोरी वो हिलाती। वो कहे तो हँसूं, वो कहे तो चलूं, वो कहे तो खाऊँ, उसी राह पर ढलूं। मैं नहीं रही मैं, बस परछाईं हूं उसकी, हर पल निभा रही भूमिका जो थी उसकी। आखिर क्या चाहती है, क्यों यूं थमा दिया मन? कठपुतली बन गई हूं, बिना जीवन के जन। हाँ… और कोई नहीं, वही है मेरी माँ, जिसके प्यार में बंधा, आज खुद को ना पहचान।
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