Kasak
कोई करता नहीं है बात,सभी चुपचाप बैठे है दिखाकर शब्ज ख्वाबों का,हुए गुमनाम बैठे हैं कभी जो साथ रहबर थे,बचपन की अदाओं में वहीं लाकर के साहिल पे,हुए बेजार बैठे हैं गोया किस्से भी सुनने थे थोड़ी अपनी सुनानी थी यहां आकर के अब जाना सभी अंजान बैठे है दिखा है आज वर्षों बाद,खीजा में शबनमी जादू मगर गुजरे तो जाना के,शब ए अहजान बैठे हैं सदियों से जुदा थे हम,लम्हों में चले आए मगर अफसोस बचपन से सभी नादान बैठे है राजीव
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