Ka Karaj का कारज
का कारज मोहे रिझात क्यों बादल धरती पे आत क्यों ठंडी तू पवन लात क्यों बदरी तू जोर आत उपवन काहे तू खिलात चकोर काहे रोए गात डोलन को मनुज रातबिरात बौरात बेहरात और अकुलात तेरी कारी कारी बदरी देख जियरा हमार मोहित हेय जात उह बात इहई फिर याद आत काहे हाथों में तू ना समात लागे है के जैसे तू मोको समुझावत उमा मान बात काहे को तू मोहे सतात अंधियारे आत जात काहे ध्वनि फिर चेन खात काहे धीर ना बंधे बंधात काहे जियरा फिर लहे ग्रास इह घर्षण का खातिर होए जात देर दूर हम सोचे काल काहे इह कलम ना हाथ आत तुमसे कहने को लाख बात बतावें केसन बूझे ना बुझात लेके हमार इह दोई हाथ खुदको उमा धीरज बंधात आइयो कबहुं तुम फिर करन घात लखियों रागी को ये प्यारो साथ रहे देत है हमरी बात और बाकी दिन में कहें बात लेत विदाई अभी हम जात मिलहिं खातिर हमका से तुम्हई को परे आन तात ।। उमा सेलर : उमा लिखती है
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