JAZBAATO KE SAUDEGAAR
सब जज़्बातों के सौदागर थे, जिस्म की प्यास को इबादत बना लिया। जब रूह सिसकती रही तन्हाई में, किसी ने दस्तक तक न दी, और जब जिस्म ने आवाज़ दी तब सबको याद आ गया कि हम भी ज़िंदा हैं। तक़लीफ़ में दिन गुज़रते रहे बिना किसी सवाल के, और दो दिन क्या बीते, हम कहानी से ख़ामोशी बन गए।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
