insaan
इंसान भी क्या चीज़ है, एक में वफ़ा नहीं दूसरे से वफ़ा की उम्मीद है दुनिया की ये रीत है पहले हम मीत, फिर एक दूसरे के अतीत है। महफिल – ए – आशिकों में, कुछ इस कदर अपना हाल बताए बैठे हैं कि, इश्क के खंजर दिल में गड़ाए बैठे है. ग़म के प्याले चढ़ाए बैठे है.. उसका छूना, जख्म पे मरहम सा प्रतीत है, उसका जाना, अब कोई दर्द भरा गीत है। ये लिखाई अब शोर मचाती है, सांस लेते इस लाश को जगाती है। सुलाती है, उसको भूलती है कमबख्त, रुलाती है। खोल के शब्दकोश को शब्दों में खो सा जाता हूं खुद को, कोशा जाता हूं। इंसान भी क्या चीज़ है, एक से जख्म मिले नहीं, कि, दूसरे से मरहम की उम्मीद है।।
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