hum
यो मांसं न भक्षयति, मन्त्रेषु च निरतः सदा, धर्मे स्थिरः स्वकर्मणि, ज्ञानी रूपेण दृश्यते। सत्त्वेन संततं युक्तोऽपि, यदि मानं समाचरेत्, अहंभावं समालभ्य, परे जीवने विचेष्टते॥ न तं गृहाण जीवनाय, न तस्य वचनं शृणु। आत्मधर्मे स्थितो नित्यं, विवेकं धारय स्वयम्। मा भूः पराधीनवशः, मा गच्छ वञ्चनां प्रति, स्वभावं रक्ष यत्नेन, स्वमार्गं मा परित्यज॥ जो व्यक्ति मांस नहीं खाता, सदा मंत्रों में रत रहता है, धार्मिक दिखता है, अपने कर्म में स्थिर है, और ज्ञानी प्रतीत होता है। जो सत्त्व से युक्त है, फिर भी यदि वह अपने अहंकार से दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप करने का प्रयास करे — तो ऐसे व्यक्ति को अपने जीवन में स्थान मत दो, उसकी बातों को न मानो। अपने आत्मधर्म में नित्य स्थित रहो, और स्वयं विवेक का उपयोग करो। कभी पराधीन मत बनो, धोखे या आडंबर के पीछे मत चलो। अपने स्वभाव और स्वतंत्रता की रक्षा करो, और अपने पथ को कभी न त्यागो।
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
