hh
बस अब मैं थक गया हु उम्मीदें बिखर रही हैं और मैं हार रहा हु जो दर्द है ही नहीं उससे भी कराह रहा हु क्यूं हर पन्ने से नही जुड़ जाता इतनों की चाहतें आगोश में है फिर क्यूं वो पराया चेहरा ही भाता जब लकीरें उसकी किसी और के साथ हैं फिर क्यूं चुप नहीं होते मेरे जज्बात हैं ना साथ मिल सकता ना दूरी उससे मंजूर है अब बड़े फकीरियत से हालात हैं।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
