~Gunehgaar~
अगर नफ़रत है, तो उस एक क़रीबी से, नाराज़ हूँ तो मैं उसी एक शख़्स से। दर्द दिया था उसे, रुलाया था मैंने जिसे। वो हर बार उसके साथ खड़ा रहा, हर टूटन में वो सहारा बना रहा। जितना कर सकता था, उतना उसने किया, जितना हुआ, उसे ही तोड़ा गया। दर्द भी दिए, आँसू भी दिए, उसकी हर ख़ुशी उससे छीन लिए गए होंठों की मुस्कान तक ले ली पर फिर भी उसके प्यार की क़दर न की। उसके भरोसे पर दाग़ लगाया गया उसके सपनों का आशियाना जला दिया गया जिसे सहारा मिलना भी मुश्किल है, जिसका दिल ख़ुद तोड़ा गया। जिसकी आँखों में कभी बसा करती थी आज उसी की यादों में एक दर्द बनकर रह गई है हाँ, वो शख़्स मैं ही थी, जिसने कभी उसकी क़दर नहीं की थी। आज जब आईने में ख़ुद को देखती हूँ, तो सबसे ज़्यादा नाराज़ ख़ुद से ही होती हूँ। काश वक़्त लौट आता, तो उसे यूँ टूटने न देती। जिसे दुनिया से बचाना था मुझे, उसी को अपने हाथों से न खो देती।
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
