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हर शख्स में मुझे तुम ही क्यों नज़र आते हो या हर शख़्स तेरी शबाहत लिए फिरता है मुझे बताओ मुझे बताओ ये मुसाफ़त मैं अकेले किस तरह काटूं तुम तो मज़े में ज़िन्दगी गुज़ारोगे और मैं तुम्हारी यादों के सहारे जिए जाऊंगी ये कोई बात कोई इंसाफ़ तो नहीं होता जबके हम दोनों ही मुजरिमाने मुहब्बत हैं फिर मुसतहिक़ ए सज़ा आख़िर अकेले मैं ही क्यों ठहरूं? तुम्हें भी शरीक होना है सज़ा की साझेदारी में तुम्हें भी हर उस ग़म हर दर्द से गुज़रना है जो दर्द मेरी ज़ात का हिस्सा बन चुका है जो दर्द मुझ पे हावी है मैं जिस दर्द की पनाह में हूँ....
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