diary
एक और नया साल आने को है। सभी को बदलाव की एक उम्मीद रहती है, किसी को खुद से किसी को दुनिया से । बदलाव की उम्मीद रखना लाज़मी भी है, मेरा मानना है कि हमारे जीवन के बदलाव और उन्नति हमारी टर्म एंड कंडीशन के हिसाब से ही हो तो अच्छा है। एक बार मित्र के साथ फरीदाबाद जाना हुआ, उन दिनों सूरजकुंड मैला अपने चरम पर था असंख्य पशु संपदा, हरयाणवी पहनावा, कला, भोजन, कलाकार, दुकानें, झूले और आंखों में ना समाई जा सकने वाली चकाचौंध । मगर इतना सब कुछ होते हुए भी एक बच्चा चीख-चीख कर रोए जा रहा था, पास जाकर मालूम हुआ कि बच्चा अपने माता-पिता से बिछड़ गया है। स्थानीय लोगों द्वारा उसका नाम, पता पूछने की कोशिश की जा रही थी परंतु बच्चे की चीख व सिसकियां निरंतर जारी थी। बच्चे को चुप कराने के लिए कई प्रलोभन दिए गए, उससे खाना, खिलौने, पोशाक, झूले, ऊंट की सवारी आदि के बारे में कहा गया, बच्चा सभी के लिए एक तरफा नकारता चला गया। एक नादान बच्चे के आगे तमाम बुद्धिजीवियों को इस तरह असफल देखकर, मुझे मेरे जीवन की व्यक्तिगत असफलताओं का दुख कम कर गया। मैं मुस्करा उठा.........
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