पतझड़ और वसंत By प्रशांत
मैं पूछूं तुमसे कैसी हो, तो सच बताना, मन के भेद ना बता सको तो झूठी बातें ना बनाना, मैं पूछूंगा हर शाम को तुम्हारे गुजरे दिन के बारे में, तुम “आज पता है क्या हुआ” बोलके दिन भर की कहानी सुनाना। मुझे चाहिए एक बक्से में बचपन के खिलौने तुम्हारे, फिर हम साथ में वो पल जिएंगे, जो तुमने मेरे बिन गुजारे। कभी कभी मैं सोचता हूं क्या मैं सच में तुम्हारे लायक हूं, या फिर अपनी बिन मतलब कविताओं जैसा नालायक हूं। तुम हो साफ सुंदर गंगा सी पावन प्रिय, मैं हूं किसी बेनाम नदी सा। तुम हो किसी शहर में परफेक्शन की दुकान, मैं हूं किसी गांव का खण्डर मकान प्रिय। तुम्हारी बातों से सारी थकान दूर हो जाती है, खुशबू आती है उन हवाओं से जो तुम्हें छूकर आती हैं। मैं चाय नहीं पीता पर सोचता हूं कुछ पल तुम्हारे साथ इसका स्वाद लूं, क्या पता इसी बहाने खुद को तुम्हारे आईने में ढाल लूं। तुम हो मेरे दिल के हर कोने में, तुम ही मेरा घर वार हो, जो मुझे सबसे ज्यादा पसंद तुम वो मेरा दिन इतबार हो। काश तुम मेरे शब्दों को समझ पाते, काश तुम मेरे प्यार की अनुभूति कर पाते, मेरी पहली और आखिरी पसंद हो तुम, मुझ जैसे पतझड़ के लिए वसंत हो तुम।
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